लेखक : जो हन्टर
सहयोगी : कामिनी सक्सेना
घर पर खाना खाते खाते शाम के सात बज गये थे। मैने जो से कहा - "जल्दी करो वर्ना रात ज्यादा हो जायेगी…… फिर तुम्हारे पुराने वाले मकान को भी तो देखना है…"
अन्दर से मां बोली…- "उस पुराने मकान में मत जाना… सुबह जाना वहां पर…।"
"बस बस… ीक है… हो गया…… ये बैग रख लो……"
जो जल्दी से उ ा और कुछ सामान पेक किया और बोला,"चलो कामिनी ……"
हम दोनो ने अपना अपना सामान उ ाया और नीचे आ गये। कार में सामान रखा और जो ने कार स्टार्ट कर दी।
"पहले समुन्दर के किनारे बीच पर चलते हैं……" मैं खुश थी कि आज बीच की सैर करने को मिलेगी। गाडी बीच की तरफ़ चल दी। मुझे लगा कि शायद बरसात होने वाली है। मैने मायूसी भरे शब्दों में कहा, "यार जो…… बरसात हो जायेगी तो फिर क्या मजा आयेगा………"
"नहीं होगी……यहां तो हमेशा ऐसा ही रहता है।"
लेकि
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